डॉ० डाल्टन के ‘अधिकतम सामाजिक कल्याण’ सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

आज लोकवित्त का उद्देश्य समाज को अधिक से अधिक सुख-सुविधाएँ पहुँचाना है। इस सम्बन्ध में डाल्टन ने ‘अधिकतम सामाजिक लाभ का सिद्धान्त’ प्रतिपादित किया है। उसके अनुसार, “राजस्व की सर्वोत्तम प्रणाली वह है, जिसमें राजकीय आय-व्यय सम्बन्धी कार्यों के फलस्वरूप अधिकतम सामाजिक लाभ प्राप्त होता है।” प्रो० पीगू ने इसे अधिकतम कुल कल्याण का सिद्धान्त तथा कुछ अन्य अर्थशास्त्रियों ने इसे ‘सार्वजनिक वित्त का सिद्धान्त’ नाम दिया है।

डाल्टन के ही शब्दों में, “लोकवित्त के मूल में एक बुनियादी सिद्धान्त होना चाहिए। इसे हम अधिकतम सामाजिक लाभ का सिद्धान्त कह सकते हैं। लोकवित्त की समस्त क्रियाएँ वास्तव में समाज के एक वर्ग से दूसरे वर्ग में क्रय शक्ति का हस्तान्तरण हैं। इस क्रय शक्ति के हस्तान्तरण का मुख्य उद्देश्य अधिकतम सामाजिक लाभ को प्राप्त करना है।

अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त की व्याख्या

अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त की व्याख्या करने के लिए लोकवित्त की क्रियाओं को निम्न तीन भागों में बाँटा जा सकता है – (1) कर और सार्वजनिक व्यय की सीमा (2) प्रसाधनों का वितरण (3) कर भार का वितरण ।

1. कर और सार्वजनिक व्यय की सीमा करों और सार्वजनिक व्यय की क्या सीमा होनी चाहिए। इस विषय में डाल्टन का मत है, “लोकवित्त प्रत्येक दिशा में उस सीमा तक बढ़ना चाहिए, जहां तक कि व्यय से उत्पन्न होनेवाला संतोष राज्य द्वारा लगाये गये करों से उत्पन्न होने वाले असन्तोष के बराबर न हो जाय।” यही सार्वजनिक व्यय एवं सार्वजनिक आय दोनों की आदर्श सीमा है। इसी विचार को पीगू ने निम्न शब्दों में व्यक्त किया है, “प्रत्येक दिशा में व्यय उस सीमा तक करना चाहिए, जहाँ अन्तिम शिलिंग के व्यय से प्राप्त सन्तुष्टि सरकारी सेवाओं के द्वारा प्राप्त किये गये अन्तिम शिलिंग से हुई सन्तुष्टि की हानि के बराबर हो जाय।”

यह सिद्धान्त सीमान्त उपयोगिता नियम तथा उपयोगिता ह्रास नियम पर आधारित है। सरकार द्वारा आय प्राप्त करने तथा व्यय करने का परिणाम सदा ही क्रय-शक्ति का हस्तान्तरण होता है। सरकार एक पक्ष से कर तथा ऋणों के रूप में आय प्राप्त करती है और दूसरे पक्ष (शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, पेन्शन आदि) पर धन व्यय कर हस्तान्तरित कर देती है। इस प्रकार वह समाज में धन के वितरण की असमानता को दूर करने का प्रयास करती है। अतः राज्य की नीति इस प्रकार निर्धारित होनी चाहिए कि कर के द्वारा सीमान्त सामाजिक त्याग राजकीय आय के व्यय द्वारा सीमान्त सामाजिक सन्तोष के बराबर हो, तभी अधिकतम सामाजिक लाभ हो सकता है।

परन्तु ज्यों-ज्यों कर की मात्रा बढ़ायी जाती है, लोगों के पास द्रव की मात्रा घटती जाती है और कर देने वालों में असन्तोष की मात्रा बढ़ायीं जाती है। इसी प्रकार ज्यों-ज्यों राजकीय व्ययों में वृद्धि की जाती है, लोगों की द्राव्यिक आय में वृद्धि हो जाती है और लोगों की सीमान्त सन्तोष, में कमी होती जाती है। अतः अधिकतम सामाजिक लाभ के अनुसार कर मात्रा उस बिन्दु तक ही बढ़ाई जानी चाहिए, जहाँ पर कर देने वालों का सीमान्त सन्तोष में कमी होती जाती है। अतः अधिकतम सामाजिक लाभ के अनुसार कर मात्रा उस बिन्दु तक ही बढ़ायी जानी चाहिए, जहाँ पर कर देने वालों का सीमान्त असन्तोष व्यय से प्राप्त सीमान्त सन्तोष के बराबर हो जाय। करो की मात्रा को उस सीमा से आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा, क्योंकि समाज को लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होगी।

अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त को कुल सामाजिक लाभ वक्र तथा कुल सामाजिक त्याग वक्र से भी समझा जा सकता है। अधिकतम सामाजिक लाभ तब प्राप्त होगा, जब कुल सामाजिक लाभ तथा कुल सामाजिक त्याग के बीच अन्तर अधिकतम होगा।

2. प्रसाधनों का वितरण (आय का वितरण) – सार्वजनिक आय-व्यय की आदर्श सीमा जान लेने के बाद यह प्रश्न उठता है कि प्रसाधनों का वितरण किस प्रकार किया जाए? जिस प्रकार एक व्यक्ति अपनी आय से अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करना चाहता है, उसी प्रकार राज्य भी अपने व्यय से अधिकतम सामाजिक लाभ प्राप्त करना चाहता है। व्यक्ति की भाँति राज्य भी इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सम सीमान्त तुष्टिगुण नियम का पालन करता है। राज्य व्यय की राशि को विभिन्न मदों पर इस प्रकार व्यय करें कि प्रत्येक मद पर व्यय की गयी सीमान्त इकाई से समाज को मिलने वाली उपयोगिता लगभग बराबर हो ।

3. कर भार का वितरण – व्यय की विभिन्न मदों के साधनों का वितरण निश्चय करने के बाद यह जानना आवश्यक होता है कि करों की कुल राशि को विभिन्न करों से कैसे प्राप्त किया जाय ? इस सम्बन्ध में हमें सम सीमान्त त्याग के लिए नियम का सहारा लेना होगा। करों का भार विभिन्न स्रोतों पर इस प्रकार वितरित करना चाहिए कि प्रत्येक स्रोत का सीमान्त त्याग समान हो जाय। ऐसा करने से ही समाज द्वारा किये गये त्याग की मात्रा न्यूनतम रह सकती है। प्रो० पीगू के अनुसार, “न्यूनतम सामूहिक त्याग को, लिए करों के इस प्रकार से वितरति करना चाहिए कि द्रव्य के रूप में दिये गये द्रव्य की सीमान्त उपयोगिता सभी करदाताओं के लिए समान रहे।”

सामाजिक लाभ की कसौटियाँ

यह जानने के लिए कि अमुक बिन्दु पर सामाजिक लाभ अधिकतम हो रहा है, डॉ. डाल्टन ने निम्नलिखित कसौटियाँ बतायी हैं –

1. समाज की सुरक्षा व शान्ति – प्रत्येक सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह देश की बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा करें तथा आन्तरिक शान्ति बनाये रखे। अतः इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सेना, पुलिस, जेल तथा न्यायालय पर किया गया व्यय अनिवार्य तथा न्यायोचित है। शान्ति एवं सुरक्षा से ही आर्थिक कल्याण में वृद्धि होती है।

2. उत्पादन शक्ति में सुधार – लोकवित्त की क्रियाएँ इस प्रकार क्रियान्वित की जाएँ कि समाज की उत्पादन शक्ति में सुधार हो, अर्थात् (1) उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो, ताकि प्रत्येक श्रमिक द्वारा कम परिश्रम करके अधिक उत्पादन किया जा सके। (2) उत्पादन संगठन प्रबन्ध में सुधार हो, ताकि बेरोजगारी व अन्य कारणों से होनेवाले विनाश को कम से कम दिया जा सके (3) उत्पादन के ढाँचे अथवा स्वरूप में सुधार हो, ताकि आवश्यकताएँ सर्वोत्तम ढंग से पूरी की जा सके।

वितरण में सुधार – आय का वितरण परिवार की आवश्यताओं के साथ-साथ निपुणताओं और प्रयत्नों के अनुरूप होना चाहिए।

3. डाल्टन के अनुसार, “आय के वितरण की असमानताओं को कम करना इस कारण आवश्यक है कि इससे लोगों तथा परिवार को आवश्यकतानुसार आय प्राप्त होगी और वे उसका सदुपयोग करने में समर्थ होंगे।” वितरण में सुधार से तात्पर्य है कि विभिन्न व्यक्तियों एवं परिवार की आय असमानताओं को कम करना तथा निर्धन वर्ग के लोगों की आयों में विभिन्न समयों में होनेवाली घट-बढ़ को कम करना।

4. भविष्य के लिए व्यवस्था – राज्य को वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ भावी पीढ़ी के हितों की भी रक्षा करनी होती है। अतः उसे वर्तमान पीढ़ी के अपेक्षाकृत छोटे लाभ की तुलना में भावी पीढ़ी के अपेक्षाकृत बड़े लाभ को वरीयता देनी चाहिए। डाल्टन के अनुसार, “राजनीतिज्ञ वर्तमान का ही नहीं वरन् भविष्य का भी संरक्षक होता है। व्यक्ति मरते रहते हैं, लेकिन समाज, जिसका कि वे अंग हैं, जीवित रहता है। अतः राजनीतिज्ञों को चाहिए कि वर्तमान के कम सामाजिक लाभ की तुलना में भविष्य के अधिक सामाजिक लाभ को वरीयता दें।”

5. आर्थिक स्थिरता तथा रोजगार – सामाजिक लाभ को अधिकतम करने के लिए देश में व्यावसायिक दशाओं को स्थिर बनाये रखना तथा समस्त उतार-चढ़ावों को समाप्त करना आवश्यक है। सार्वजनिक व्यय में वृद्धि करके मन्दी के प्रभावों को दूर किया जा सकता है तथा सार्वजनिक ऋण व भारी कराधान द्वारा मुद्रास्फीति के प्रभावों को दूर किया जा सकता है।

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